✝️ तीसरी वाणी:
यूहन्ना 19:26–27
“यीशु
ने अपनी माता और उस चेले को जिसे वह प्रेम रखता था, पास खड़े देखा,
तो
अपनी माता से कहा, 'हे नारी, देख, यह तेरा पुत्र है।' फिर उस चेले से कहा, 'देख,
यह
तेरी माता है।’ और उसी घड़ी वह चेला उसे अपने घर ले गया।”
प्रश्न:
यीशु क्रूस पर इतनी पीड़ा में होकर भी अपनी माँ की चिंता क्यों कर
रहा था?
इसमें हमारे लिए क्या आत्मिक शिक्षा है?
पृष्ठभूमि और संदर्भ (Background & Context):
यीशु क्रूस पर लटक रहा है, शरीर से खून बह रहा है, सांसें
टूट रही हैं, और हर अंग पीड़ा में है। फिर भी उसकी आँखें अपनी माँ मरियम को ढूँढती
हैं, जो चुपचाप, टूटा हुआ दिल लेकर वहाँ खड़ी है। और
उसके पास खड़ा है एक चेला यूहन्ना, जिसे यीशु प्रेम करता था।
यह वाणी केवल माँ-बेटे का संबंध नहीं दर्शाती, लेकिन यह एक उदाहरण है सच्चे प्रेम, जिम्मेदारी और आत्मिक
परिवार का।
1. यीशु ने दर्द में भी अपनों का ध्यान रखा
वाणी: "हे नारी, देख, यह
तेरा पुत्र है।"
🔹 मतलब:
यीशु
खुद दर्द में था, फिर भी अपनी माँ मरियम की परवाह कर रहा था। उसने यूहन्ना को कहा कि अब वो उसका बेटा है – यानी वह अब उसकी
देखभाल करे।
🔹 सिखावन:
सच्चा
प्रेम वही है, जो अपने दुःख में भी दूसरों की परवाह करे।
यह दर्शाता है कि सच्चा प्रेम केवल शब्दों से नहीं, जिम्मेदारी
से प्रकट होता है।
✅ उदाहरण:
मोसेस अपनी माँ को फ़िरौन के घर से अलग नहीं करता – आज के जमाने मे
उसको हम नर्स कह सकते है वैसे बनाकर वापस फ़िरौन के घर लाता है।
➡️
एक
पुत्र का धर्म है माँ की देखभाल करना।
✅ उदाहरण:
क्रूस
की पीड़ा में भी यीशु ने मरियम के लिए एक घर सुनिश्चित किया।
➡️
जब
हमारा जीवन संघर्ष में हो, तब भी हमे दूसरों की ज़रूरतें देखनी
चाहिए और उसको पुरी कारणी चाहिए।
🛐 आत्मिक शिक्षा:
सच्चा
प्रेम केवल भावनाओं में नहीं, जिम्मेदारी निभाने से प्रकट होता है।
लागूकरण:
- क्या
मैं अपने माता-पिता की परवाह करता हूँ जब वे कुछ नहीं कह पाते?
- क्या
मैं कष्ट में भी दूसरों की ज़रूरतों को देखता हूँ?
2. यीशु ने एक नया आत्मिक परिवार स्थापित
किया
वाणी: "यह तेरी माता है।"
🔹 मतलब:
यीशु
ने यूहन्ना और मरियम के बीच नया रिश्ता बना दिया – अब वे खून से नहीं, आत्मा
से जुड़ गए।
🔹 सिखावन:
यीशु
दिखा रहा है कि कलीसिया में हम सब आत्मिक परिवार हैं, हमें एक-दूसरे
की ज़िम्मेदारी लेनी है।
यीशु यूहन्ना और मरियम के बीच एक नया रिश्ता बनाता है – आत्मिक
परिवार का।
✅ उदाहरण:
कलीसिया
में जो विधवा अकेली है, वो कहती है, “कलीसिया ही अब मेरा परिवार है।”
➡️
परमेश्वरने
कलिसिया को एक दूसरे की सेवा के लिए नियुक्त किया है। लेकीन क्या आज हम उस काम को
कर रह है।
✅ उदाहरण:
प्रेरितों
के काम 2 में लिखा है – “वे सब कुछ आपस में बाँटते थे।”
➡️
प्रेम
और एक दूसरे की जरूरते पूरी करना यह आत्मिक परिवार का चिन्ह है।
✅ उदाहरण:
यीशु
ने कहा: “जो मेरे पिता की इच्छा पूरी करता है, वही मेरा भाई,
बहन
और माता है।” (मत्ती 12:50)
➡️
परमेश्वर
का परिवार खून से नहीं, आत्मा से जुड़ा होता है। इसीलिए पिता
की ईच्छा पूरी करनेवाला ही येशु के
आत्मिक परिवार का हिस्सा है।
🛐 आत्मिक शिक्षा:
कलीसिया
केवल सभा नहीं, एक आत्मिक परिवार है जहाँ एक-दूसरे की जिम्मेदारी उठाकर सेवा करना
पड़ती है।
लागूकरण:
- क्या
मैं अपनी कलीसिया के सदस्यों को परिवार समझता हूँ?
- क्या
मैं अकेले और जरूरतमंद लोगों को अपनाने को तैयार हूँ?
3. यीशु ने हमें सेवा और प्रेम का आदर्श
दिया
वचन: “उसी घड़ी वह चेला उसे अपने घर ले गया।”
🔹 मतलब:
यूहन्ना
ने तुरंत यीशु की बात मानी और मरियम को अपने घर ले गया, और वो उसकी सेवा
करने लगा।
🔹 सिखावन:
सच्चा
प्रेम तब दिखता है जब हम तुरंत आज्ञा मानते हैं और सेवा करते हैं।
यूहन्ना ने आज्ञा मानी। उसने मरियम को अपनाया और उसकी सेवा की।
✅ उदाहरण:
रूथ
ने नाओमी से कहा: “तेरा परमेश्वर मेरा परमेश्वर होगा।”
➡️
रिश्ता
खून से नहीं, समर्पण से बनता है।
✅ उदाहरण:
यीशु
ने शिष्यों के पैर धोकर कहा: “मैंने जो किया, तुम भी करो।”
➡️
प्रेम
सेवा में सबसे ज्यादा दिखता है।
🛐 आत्मिक शिक्षा:
प्रेम
आज्ञा मानने, सेवा करने और जिम्मेदारी उठाने में सच्चा होता है।
लागूकरण:
- क्या
मैं परमेश्वर की आज्ञा का तुरंत पालन करता हूँ?
- क्या
मैं कलीसिया में सेवा का भाग लेता हूँ?
निष्कर्ष:
यीशु की तीसरी वाणी हमें सिखाती है:
- पीड़ा
में भी अपनों का ध्यान रखना
- आत्मिक
परिवार के सम्मान और महत्त्व को समझना
- प्रेम
को सेवा और आज्ञाकारिता से प्रकट करना
🙏 प्रार्थना:
“हे यीशु, तूने क्रूस पर भी दूसरों के लिए सोचा।
मुझे
भी ऐसा दिल दे, जो सेवा करे, अपनों का ध्यान रखे,
और जो
कलीसिया का आत्मिक परिवार दिया है उसको मै प्रेम और जिम्मेदारी से जुड़ा रहूँ।
आमीन।”

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