क्या आपने कभी सोचा है कि मसीही विश्वास कितना अलग होता यदि हमारे पास बाइबल नहीं होती? अगुवे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक शिक्षाओं को पारित करते जाते, लेकिन उनके विचारों का मूल्यांकन करने के लिए कोई तरीका नहीं होता, कोई ऐसा मानक नहीं होता जिसे द्वारा भिन्न विचारों के बीच सहीं गलत का फैसला किया जा सके।
यह परिस्थिति कुछ वैसी ही होती जैसी मूसा के दिनों में बहुत से इस्राएलियों की थी। उनके पूर्वजों ने अतिप्राचीन इतिहास, कुलपिताओं और उनसे जुडी सारी कहानियों को उन्हें बताया था और यह भी, कि किस तरह परमेश्वर ने इस्राएल को मिस्र से छुटकारा दिया, उन्हें अपनी व्यवस्था दी, और प्रतिज्ञा किए हुए देश की ओर उनकी अगवाई की। लेकिन प्रश्न यह उठ रहे थे कि इस्राएल की वर्तमान परिस्थितियों, और भविष्य के लिए परमेश्वर की क्या योजना है, और इस बारे में उनके विश्वास को किस दिशा में बढ़ना था? इन विषयों पर अलग-अलग विचार मौजूद थे और उन्ही विचारों के बीच उन्हें फैसला लेना था, परन्तु कैसे? इन्ही सब प्रश्नों का उत्तर देने हेतु परमेश्वर ने बाइबल की पहली पांच पुस्तकों को उन्हें दिया जो उनके विश्वास के मानक या मापदंड के रूप में इस्तेमाल की जा सके। आज उन्ही पुस्तकों को हम पेन्टाट्यूक के नाम से जानते हैं।




