अगर यीशु आज आपके सामने खड़े हो जाएं, तो क्या आप सच में उसे पहचान पाएंगे या फिर खो देंगे?
एक सच्चाई पर ध्यान दीजिए।
जब यीशु पहली बार इस संसार में आए, तो उसे सबसे अधिक किसने अस्वीकार किया?
पापियों ने नहीं, लेकिन धार्मिक लोगों ने।
वे शास्त्र जानते थे।
वे प्रार्थना करते थे।
वे परमेश्वर के बारे में शिक्षा देते थे।
फिर भी, जब यीशु उनके सामने खड़े थे।
उन्होंने कहा,“हम तुम्हें नहीं जानते।”
और अंत में उन्होंने उन्हें क्रूस पर चढ़ा दिया।
अब प्रश्न उठता है……
यदि आज यीशु आपके सामने खड़े हो जाएं, तो क्या आप उसे पहचान पाएंगे, या वही गलती दोहराएंगे?
बिंदु 1: सबसे बड़ा धोखा: “मैं जानता हूँ।”
सबसे खतरनाक स्थिति वह होती है, जब मनुष्य यह मान लेता है कि वह सब कुछ जानता है।
फरीसियों ने भी यही समझा था।
उन्हें व्यवस्था का ज्ञान था।
उन्हें धर्म का ज्ञान था।
उन्हें लगा कि वे यीशु को जानते हैं।
लेकिन जब स्वयं यीशु उनके सामने खड़ा था, उन्होंने उसे अस्वीकार कर दिया।
गहरी सच्चाई यह है:
ज्ञान यदि समर्पण के बिना हो, तो वह अंधापन बन जाता है।
आज भी बहुत लोग बाइबल पढ़ते हैं, संदेश सुनते हैं, चर्च जाते हैं,
लेकिन उनका हृदय नहीं बदलता।
और इसी कारण वे पहचान नहीं पाते।
बिंदु 2: हम यीशु को नहीं, अपने बनाए हुए रूप को मानते है।
आज बहुत लोग असली यीशु का अनुसरण नहीं करते,
लेकिन अपने मन का एक सहज और सुविधाजनक रूप मानते हैं।
एक ऐसा यीशु:
जो कभी गलत नहीं ठहराता,
जो कोई परिवर्तन नहीं मांगता,
जो केवल आशीर्वाद देता है।
लेकिन बाइबल का यीशु अलग है।
वह पाप को प्रकट करता है।
वह जीवन बदलने को कहता है।
वह आत्म त्याग और क्रूस उठाने की मांग करता है।
जब ऐसा यीशु सामने आता है, तो मनुष्य पीछे हट जाता है।
क्योंकि सत्य असुविधाजनक होता है।
बिंदु 3: पहचान का प्रमाण - क्या उसकी आवाज आपको बदलती है?
यदि आप सच में यीशु को जानते हैं, तो उसकी आवाज केवल आपको सांत्वना नहीं देगी, वह आपको चुनौती भी देगी।
जब वह कहता है:
पाप को छोड़ दो,
क्षमा करो,
अपने आप को नकारो,
तो भीतर एक संघर्ष उत्पन्न होता है।
यदि उसकी आवाज कभी आपको असहज नहीं करती,
तो संभव है कि आप उसकी आवाज सुन ही नहीं रहे हैं।
सच्ची पहचान वही है, जहां मनुष्य बदलता है।
बिंदु 4: भीड़ कभी सही पहचान नहीं करती
इतिहास में भीड़ ने पहले यीशु का स्वागत किया, और कुछ ही समय बाद उसी भीड़ उसे अस्वीकार कर दिया।
क्यों?
क्योंकि भीड़ सत्य से नहीं, भावनाओं से चलती है।
आज भी लोग प्रवृत्तियों और लोकप्रिय विचारों के पीछे चलते हैं,
लेकिन सत्य का मार्ग अक्सर अकेला होता है।
यदि आप वास्तव में यीशु को पहचानना चाहते हैं,
तो आपको भीड़ से अलग चलने की तैयारी रखनी होगी।
बिंदु 5: असली यीशु की पहचान - संबंध, केवल धर्म नहीं
अंत में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पहचान केवल धार्मिक क्रियाओं से नहीं आती, लेकिन जीवित संबंध से आती है।
बहुत लोग कहेंगे:
हमने प्रार्थना की,
हमने सेवा की,
हमने बहुत कुछ किया।
लेकिन उत्तर मिलेगा:
“मैं तुम्हें नहीं जानता।”
यह शब्द बहुत गंभीर हैं।
इसका अर्थ है कि परमेश्वर को प्रभावित करना नहीं,
लेकिन उसे जानना और वो जैसा जीवन जीता है वैसा जीना आवश्यक है।
कल्पना कीजिए कि आज यीशु आपके सामने खड़े हैं।
न कोई विशेष पहचान,
न कोई बाहरी महिमा,
सिर्फ एक साधारण रूप में।
क्या आप उन्हें पहचानेंगे?
या आप उन्हें अनदेखा कर देंगे?
या आप उन्हें अस्वीकार कर देंगे?
पहली बार संसार ने यीशु को अस्वीकार कर दिया। क्या दूसरी बार आप भी वही करेंगे?


बहुत अच्छा संदेश हे
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