संदेश का शीर्षक: ✝ क्षमाशीलता की ऊँचाई: क्रूस से कही गई पहली पुकार
📖 मुख्य पद:
लूका 23:34 – “तब यीशु ने कहा, ‘हे पिता, इन्हें क्षमा कर; क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर
रहे हैं।’”
प्रिय भाइयों और बहनों,
आज हम मसीह की उस पहली वाणी पर ध्यान करेंगे जो उन्होंने क्रूस पर
लटकते समय कही। सोचिए, यह वो क्षण था जब वह अत्यधिक पीड़ा में था– न केवल शारीरिक रूप से, पर आत्मिक और भावनात्मक रूप से भी।
क्यों यह वाणी हमारे लिए महत्वपूर्ण है?
प्रभु यीशु मसीह के क्रूस पर बोले गए सात वचनों में यह पहली वाणी है।
और पहला शब्द हमेशा विशेष होता है — वह हमारे दिल की प्राथमिकता को प्रकट करता है।
सोचिए ज़रा... जब हम अत्यधिक पीड़ा में होते हैं — तो हमारी पहली
प्रतिक्रिया क्या होती है?
“क्यों मेरे साथ ऐसा हुआ?”
“मैं इसे कभी माफ नहीं करूँगा।”
लेकिन जब प्रभु यीशु पीड़ा में थे, लहू बहा रहे थे, अपमान सह रहे थे — तो उनके मुँह से पहला वचन क्या निकला?
“हे पिता, इन्हें क्षमा कर…”
आज हम इसी वाणी की आत्मिक गहराई को समझेंगे, और जानेंगे कि मसीही क्षमा क्या है, और कैसे हम इसे
अपने जीवन में ला सकते हैं।
✝ I. ऐतिहासिक और धार्मिक पृष्ठभूमि
1. यीशु की स्थिति: यीशु उस समय क्रूस पर टंगे हुए थे, उनके हाथों और पैरों में कीलें गड़ी थी। पीड़ा इतनी तीव्र थी कि सांस
लेना भी कठिन हो रहा था। चारों ओर लोग मजाक / उपहास कर रहे थे, और वह अपने प्राणों के अंतिम क्षणों में था।
2. किन्होंने यीशु को कष्ट दिया?
- यहूदी अगुवे
– ईर्ष्या और धार्मिक अंधापन में थे।
- रोमी सैनिक
– आज्ञा मानते हुए, लेकिन निर्दयता से।
- भीड़
– जिन्होंने “होशाना” से “क्रूस दो” तक का सफर किया – अज्ञानता
और बहकाव में थे।
- शिष्य
– जिन्हें वह प्रेम करते थे, वे भी डरकर
भाग गए। पतरस ने तीन बार इन्कार किया।
और इन सबके बीच यीशु क्या कहते हैं? "हे पिता, इन्हें क्षमा कर।"
✝ II. इस वचन की आत्मिक गहराई
1. “हे पिता” – आत्मिक संबंध की गहराई दिखाता है।
यह पहला वचन क्यों महत्वपूर्ण है?
• यह दिखाता है कि यीशु की
प्राथमिकता क्या थी – क्षमा।
• क्रूस की सबसे बड़ी
ऊँचाई – प्रेम और क्षमा की ऊँचाई है।
यीशु ने दर्दनाक पीड़ा में भी परमेश्वर को “पिता” कहा। यह
दिखाता है कि कोई भी परिस्थिति – चाहे वह क्रूस की दर्दनाक पीड़ा ही क्यों न हो –
हमारे परमेश्वर से रिश्ते को तोड़ नहीं सकती।
📌 उदाहरण:
- दानिय्येल
3 – शद्रक, मेशक
और अबेदनगो को
आग में डाला गया,
पर उन्होंने राजा से कहा:
"हमारा परमेश्वर हमें बचा सकता है, और
यदि न भी बचाए,
तब भी हम तेरे देवताओं को नहीं
पूजेंगे।" – क्या आत्मिक विश्वास था!
- Corrie
ten Boom – एक मसीही
महिला जिसे नाज़ी कैम्प में डाला गया, जहाँ
उसकी बहन की मृत्यु हो गई। लेकिन सालों बाद, उसी
कैम्प के जेलर ने आकर माफी मांगी। और उसने कहा: “मैंने आपको माफ किया, क्योंकि मेरे पिता परमेश्वर ने मुझे पहले
क्षमा किया है।”
📖 यशायाह 49:15
– “क्या स्त्री अपने दूध पिलाए हुए बच्चे
को भूल सकती है? चाहे वह भूल भी जाए, तो भी मैं तुझे नहीं भूलूंगा।” –
हमारे परमेश्वर का ऐसा प्रेम है!
➡ सीख: जब हम दुख में
हों, तो अपनी पहचान मत भूलिए – क्योंकि हम परमेश्वर की संतान हैं।
2. “इन्हें क्षमा कर” – प्रेम का सर्वोच्च प्रमाण
यीशु ने न्याय की नहीं, दया की प्रार्थना की। वह जिन्होंने
संसार को बनाया, वह जो न्याय के सिंहासन पर बैठ सकते थे, उस क्षण यीशु ने
कहा – “इन्हें क्षमा कर।”
📌 उदाहरण:
- स्तिफन (प्रेरितों 7:60): “हे प्रभु, यह
पाप उन पर मत लगा।” – वह क्रूस की तरह ही क्षमा की आत्मा दिखा रहा था।
- ग्लैडिस
स्टेन्स
– उनके पति ग्राहम स्टेन्स और दो
छोटे बेटे जिन्दा जला दिए गए। लेकिन ग्लैडिस ने कहा: “मैं उन्हें माफ करती हूँ। मैं अपने बच्चों
और पति को वापस नहीं पा सकती, पर
मसीह के लिए मैं क्षमा कर सकती हूँ।” – यह
सच्चा मसीही जीवन है।
➡ सीख: क्षमा करने का मतलब है – अपने अधिकार को छोड़कर परमेश्वर के
प्रेम को चुनना।
3. “क्योंकि ये नहीं जानते कि क्या कर रहे हैं” – आत्मिक अंधकार की पहचान
💡 आत्मिक अंधापन क्या है?
आत्मिक अंधापन का अर्थ है – एक व्यक्ति का परमेश्वर
की सच्चाई, पाप की वास्तविकता, और अपने जीवन की आत्मिक दशा को न देख
पाना। यह आँखों का अंधापन नहीं, बल्कि हृदय और आत्मा का अंधकार है।
🔍 बाइबल के अनुसार आत्मिक अंधापन:
📖 2 कुरिन्थियों 4:4 –
“इस संसार के ईश्वर ने अविश्वासी लोगों की बुद्धि को अंधा कर दिया है, ताकि वे मसीह की महिमा के सुसमाचार का प्रकाश न देख सकें।”
➡ यहाँ “इस संसार के ईश्वर” (शैतान) ने लोगों की सोच को अंधकार में रखा
है। वे देख नहीं सकते कि वे पाप में हैं।
📌 उदाहरणों से समझें:
1. शाऊल (पौलुस) – प्रेरितों 9:1-6
- वह यह
समझता था कि वह धर्म की सेवा कर रहा है।
- परन्तु
यीशु ने कहा: “शाऊल, तू
मुझे क्यों सताता है?”
➡ वह आत्मिक अंधेपन में था, लेकिन प्रभु ने उसकी आँखें खोली।
2. क्रूस पर चढ़े अपराधी – लूका 23:39-43
- दो अपराधी:
एक ने उपहास किया,
पर दूसरे ने पश्चाताप किया।
➡ पहले को आत्मिक अंधापन ने रोका, दूसरे को सत्य का प्रकाश मिला।
🕯 आत्मिक अंधापन को कैसे पहचाने?
✅ 1. पाप को सामान्य मानना
- जैसे झूठ
बोलना,
चोरी करना, नफरत रखना — और सोचना कि यह “नॉर्मल” है।
➡ यह आत्मिक अंधापन का चिन्ह है।
✅ 2. सत्य को सुनने पर प्रतिक्रिया देना
- जब कोई
परमेश्वर की बात कहता है, और
लोग तर्क करने लगते हैं या विरोध करते हैं।
➡ क्योंकि वे नहीं देख पा रहे कि सत्य क्या है।
✅ 3. क्षमा करने में कठिनाई
- हम तब तक
क्षमा नहीं कर पाते जब तक हम यह न समझें कि सामने वाला आत्मिक रूप से देख
नहीं पा रहा।
·
जब हम आत्मिक
अंधापन को पहचानते हैं, तो हमारी दृष्टि मसीही की जैसी दृष्टि
बनती है।
हम लोगों को दंड के योग्य नहीं, चंगाई के योग्य देखने लगते हैं।
और यही पहला कदम होता है सच्ची क्षमा का।
यीशु ने उनके पाप को नकारा नहीं, पर उसकी जड़ को देखा की वे “अज्ञानता”
मे है। बहुत बार हम भी लोगों के व्यवहार को देखते हैं, पर उनके पीछे छिपे घावों, अंधकार, और आत्मिक
अज्ञानता को नहीं देखते।
📌 उदाहरण:
- शाऊल
(पौलुस)
– उसने कलीसिया को सताया, पर प्रभु ने उसे रोका और कहा: “वह मेरा चुना
हुआ पात्र है।”
- एक
अपराधी युवक जिसने
दुकान मालिक की हत्या की। उस मालिक की पत्नी ने अदालत में कहा: “मैं इसे माफ
करती हूँ,
क्योंकि यह आत्मिक अंधकार में
है।” – बाद में वह युवक मसीह में आया।
➡ सीख : क्षमा का पहला
कदम होता है – समझना कि सामनेवाला आत्मिक रूप से अंधा हो सकता है।
✝ III. आत्मिक शिक्षाएँ
1. क्षमा कमज़ोरी नहीं, सामर्थ्य है
यीशु के पास सामर्थ्य था – वह स्वर्गदूतों को बुला सकते थे। पर
उन्होंने क्षमा करने को चुना।
📖 निर्गमन 32:32
– मूसा ने कहा: “यदि तू उन्हें क्षमा न
करे, तो मेरा नाम अपनी जीवन की पुस्तक से निकाल दे।” – यह आत्मिक गहराई का
स्तर है।
➡ मसीही सामर्थ्य वह है जो बदले की जगह क्षमा को चुनता है।
2. क्षमा परमेश्वर का स्वभाव है
📖 मत्ती 5:44
– “अपने शत्रुओं से प्रेम करो।”
📖 उत्पत्ति 50:20 – यूसुफ ने भाइयों से कहा: “तुमने मेरे लिए बुरा चाहा, पर परमेश्वर ने भलाई की योजना बनाई।”
📌 नेल्सन मंडेला – क्षमा का जीवंत उदाहरण
नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के ख़िलाफ़ लड़ने वाले एक महान नेता थे। रंगभेद एक ऐसी व्यवस्था थी
जिसमें गोरों को अधिकार और सम्मान दिया जाता था, और काले लोगों
को तुच्छ समझा जाता था — उन्हें स्कूल, अस्पताल, और बसों तक में बराबरी का अधिकार नहीं था।
🩶 मंडेला ने इसके विरुद्ध आवाज़ उठाई, और इसके लिए उन्हें 27 साल तक जेल में बंद रखा गया।
- जेल में
उन्हें छोटी-सी कोठरी में रखा गया।
- पत्थर
तोड़ने का काम कराया गया।
- परिवार से
मिलने की अनुमति नहीं थी।
- शारीरिक और
मानसिक रूप से उन्हें तोड़ने की कोशिश की गई।
लेकिन जब वे जेल से बाहर निकले और राष्ट्रपति बने, तो सबको आश्चर्य हुआ कि उन्होंने अपने शत्रुओं से बदला नहीं लिया।
💬 मंडेला ने कहा:
“मैंने क्षमा को इसलिए चुना, क्योंकि अगर मैं नफरत को पकड़कर रखता, तो मैं भी जेल से बाहर होकर भी कैदी ही बना रहता।”
➡ उसने अपने अत्याचारियों को माफ कर दिया।
➡ उसने बदले की जगह मेल और एकता को चुना।
➡ उसके इस फैसले ने पूरे देश को बदल दिया।
➡ जब हम क्षमा करते हैं, तब हम परमेश्वर के स्वभाव को प्रकट
करते हैं।
3. क्षमाशीलता मसीही जीवन की पहचान है
📖 मत्ती 5:44 – यीशु ने कहा: “अपने शत्रु से प्रेम करो।”
📌 पास्टर रिचर्ड वुर्मब्रांड – क्षमा की जीवित मिसाल
वो रोमानिया में एक यहूदी मसीही सेवक थे, जिन्होंने
कम्युनिस्ट शासन के दौरान मसीह का प्रचार किया। सरकार ने उन्हें रोकने के लिए 14 साल तक जेल में बंद रखा।
🔥 उनके साथ क्या हुआ?
- उन्हें अकेली कालकोठरी में रखा गया, जहाँ कोई रोशनी या आवाज़ नहीं होती थी।
- उन्हें लगातार शारीरिक यातनाएँ दी जाती थीं – गर्म सलाखों से जलाना, पीटना, भूखा रखना।
- उनके पैरों की हड्डियाँ तोड़ी गईं, ताकि वह दोबारा प्रचार न कर सकें।
- जब
वे प्रार्थना करते, तो पहरेदार उन्हें पीटते थे।
➡ पर जब उनसे पूछा गया, “आप जेल में किसके लिए प्रार्थना करते
थे?”
उन्होंने कहा:
“मैं अपने सताने वालों के लिए प्रार्थना करता था। क्योंकि अगर मैं उनसे
प्रेम नहीं कर सकता, तो मैं मसीह का नहीं।”
🕊️ क्षमा की ऊँचाई
वह कहते थे:
“ लोग हमारा हृदय तोड़ सकते हैं, शरीर
को घायल कर सकते हैं — लेकिन हमारे अन्दर का मसीही प्रेम छीन नही
सकते।” पास्टर वुर्मब्रांड ने अपने उन सताने वालों के लिए भी प्रार्थना की जो
उन्हें मारते थे। और यही था मत्ती 5:44 का जीवंत पालन –“अपने शत्रुओं से प्रेम करो, और
जो तुम पर अत्याचार करें, उनके लिए प्रार्थना करो।”
❤️ सीख:
➡ यह आसान नहीं है – लेकिन यह मसीह का मार्ग है।
➡ जब आप उस व्यक्ति के लिए प्रार्थना कर
पाते हैं जिसने आपको सबसे अधिक चोट पहुँचाई हो —
तो आप मसीह के जैसे जी रहे हैं।
✝ IV. व्यावहारिक जीवन की सीख
- व्यक्तिगत
जीवन में:
➡ "जिसने हमारे साथ बहुत बहुत बुरा व्यवहार किया हो, सबसे पहले उसी को क्षमा करे – क्योकि यीशु हमारा क्षमा करनेवाला है।" - कलीसिया
में:
➡ "जहाँ क्षमा नहीं, वहाँ सेवा नही होती। जहाँ प्रेम नहीं, वहाँ परमेश्वर नही। इसीलिए एक दूसरे को क्षमा करके जीवन जियो ताकि प्रभु की सेवा पूरे दिल से कर सके।
3. समाज में गवाही बनें
➡ "जब दुनिया बदले का जवाब माँगती है, तब मसीही क्षमा एक जीवित गवाही बनती है।"
✝ V. जीवन में लागू करने योग्य बातें (Applications):
✅ प्रतिदिन प्रार्थना करें कि प्रभु आपको क्षमा करने वाला बनाए।
✅ जिन्होंने आपको दुख पहुंचाया हो, उनके लिए मसीह की तरह प्रार्थना करें।
✅ कठोरता को त्यागें, और पवित्र आत्मा को कार्य करने दे।
✅ जब आप क्षमा करते हैं, तो लोग आपमें मसीह के स्वभाव को
देखेंगे।
निष्कर्ष:
यीशु की पहली वाणी सिर्फ शब्द नही है – वह मसीह के हृदय को प्रकट करती
है।
"हे पिता, इन्हें क्षमा कर..." – यह वाणी हमें बुला रही है – क्या हम भी
इसी वाणी के अनुसार क्षमा का जीवन जी सकते है?
प्रश्न:
क्या आप मसीह की तरह क्षमा करने के
लिए तैयार हैं?
क्या आप उस ऊँचाई तक पहुँचना चाहते
हैं जहाँ आपके हृदय में क्षमा सबसे ऊपर हो?
🙏 आइए, आज निर्णय ले – कि हम मसीह के स्वरूप
में बढ़ते जाएँगे, और क्षमा को अपने जीवन की पहचान
बनाएँगे।
नोट: याद रखे मै भी आपके साथ सिख रहा हूँ तो यदि आप मेरे विचारों से सहमत नहीं है तो प्लीज आप एक खुद भी नोट्स बनाए और हमारे साथ शेयर कर सकते है: यह मेरी Gmail id है तो आप मेरे साथ साझा कर सकते है -sureshborvan@gmail.com. पढ़ने के लिए धन्यवाद

Amen
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