
कठिन है लेकिन सही है।
हम मीटिंग में जानेवाले ही नही बदलेंगे,
तो दूसरे लोग कैसे बदलेंगे।
【 घमंड में से नम्रता में
नफरत में से प्रेम में 】
यदि यीशु इस धरती पर हमारे जैसा ही एक साधारण मनुष्य बनकर आया और उसने प्रेम, आनन्द, शान्ति, धीरज, कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता और संयम का जीवन जिया। वैसे ही हर एक क्षेत्र में उसने सफलता का जीवन जिकर दिखाया। उसके जीवन से बहुत ही लोग प्रभावित होते है और वे भी अपना जीवन वैसे ही जीने लग जाते है, जैसा यीशु मसीहा जिया। हम उन लोगो को दिन प्रतिदिन देखते है और एक दिन वे भी सफलता का जीवन जीने लग जाते है।
लेकिन एक ही बात मुझे समझ मे नही आती की हम क्यों नही सफलता का जीवन जी पाते?
क्योंकि हम कठिन मेहनत नही करना चाहते। यदि हम चर्च में जा रहे है और अभी तक एक दूसरे से नफरत कर रहे है, या तो घमंडी बन बैठे है, तो हम दूसरे लोगो को बदल ही नही सकते, क्योंकि अभी तक हमारा जीवन ही नही बदला है।
यदि हम एक दूसरे को बदलने के लिए कितनी भी मेहनत करले लेंगे, लेकिन हमारी सारी मेहनत व्यर्थ हो जायेगा।
इसीलिए यदि हमें कठिनाई में भी सफलता का जीवन जीना है तो, हमे यीशु मसीह के जैसा जीवन जीना पड़ेगा तो ही सफलता हमारे कदमों को चूमेगी।

बिलकूल सही है ।
जवाब देंहटाएंright brother
जवाब देंहटाएं